मेरा पन्ना-18

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"मेरा पन्ना" -अल्पना वर्मा


उत्तर प्रदेश


 

भारत के उत्तर में जनसँख्या की हिसाब से सब से बड़ा प्रदेश है उत्तर प्रदेश.उत्तर प्रदेश का ज्ञात इतिहास लगभग ४००० वर्ष पुराना है,जब आर्यों ने अपना पहला कदम इस जगह पर रखा तब  वेदिक सभ्यता का उत्तर प्रदेश मे  जन्म हुआ.इन्ही  आर्यों के नाम पर भारत देश का नाम आर्यावर्त या भारतवर्ष पड़ा था.[भरत आर्यों के एक प्रमुख राजा थे].

 

मथुरा शहर में जन्मे थे भगवान कृष्ण और भगवान राम" का प्राचीन राज्य कौशल इसी क्षेत्र में था.संसार के प्राचीनतम शहरों में एक माना जाने वाला वाराणसी शहर भी यहीं है.


इस के उत्तर में हिमालय का क्षेत्र -मध्य में गंगा का मैदानी भाग -दक्षिण का विन्ध्याचल क्षेत्र है.यह सबसे अधिक '७१'  जिलों वाला प्रदेश है.एशिया का सबसे बड़ा उच्‍च न्‍यायालय इलाहाबाद में है.सोनभद्र जिला, देश का एक मात्र ऐसा जिला है जिसकी सीमाएँ सर्व चार प्रदेशों को छूती हैं.

 

लखनऊ

उत्तर प्रदेश राज्‍य की राजधानी, लखनऊ एक आधुनिक शहर है.गंगा नदी की सहायक नदी, गोमती के किनारे बसा  लखनऊ शहर अपने उद्यानों, बागीचों और अनोखी वास्‍तुकलात्‍मक इमारतों के लिए जाना जाता है.यह नवाबों के शहर के नाम से भी मशहूर है .लखनऊ शहर में सांस्‍कृतिक और पाक कला के विभिन्‍न व्‍यंजनों से भी जाना जाता है.

 

यहाँ के लोग  अपनी तहजीब ,खूबसूरत उद्यानों, कविता, संगीत, के लिए भी प्रसिद्ध है.यहाँ की चिकन की कढाई वाले परिधान और  चीनी - मिटटी के बर्तन तो आप सब ने सराहे ही हैं.

यह  बहु सांस्कृतिक शहर ऐतिहासिक रूप से 'अवध क्षेत्र 'के नाम से जाना जाता था.

प्राचीन इतिहास अनुसार लखनऊ में प्राचीन कोशल  राज्य का हिस्सा था. श्री राम ने अपने भाई लक्ष्मण को दे   दिया  इसलिए  इसे लक्ष्मणपुर या लखनपुर के नाम से जाना गया,कुछ कहते हैं की इस शहर का नाम, 'लखन अहीर' जो कि  'लखन किले' के मुख्य कलाकार थे, के नाम पर रखा गया था.अंग्रेज कहते थे-Lucknow is--Luck-now- उन के लिए यह भाग्यशाली जगह रही थी.

देखने के लिए जगह-:

१-घंटाघर -यह भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है।

२-रूमी दरवाजा

नवाब आसफउद्दौला ने यह दरवाजा 1783 ई. में रूमी दरवाजे का निर्माण भी  अकाल के दौरान बनवाया था ताकि लोगों को रोजगार मिल सके।

३-सआदत अली और खुर्शीद जैदी का मकबरा -अवध वास्तुकला का शानदार उदाहरण हैं.

४-रेज़ीडेंसी -लखनऊ रेजिडेन्सी  सिपाही विद्रोह के समय ईस्ट इंडिया कम्पनी के एजेन्ट का भवन था.

-जामी मस्जिद-इस मस्जिद का निर्माण मोहम्मद शाह ने शुरू किया था लेकिन 1840 ई. में उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने इसे पूरा करवाया.

६-छोटा या हुसैनाबाद इमामबाड़ा-इसका निर्माण मोहम्मद अली शाह ने करवाया था.

७-बनारसी बाग--यह एक चिड़ियाघर है.

८-पिक्चर गैलरी -19वीं शताब्दी में बनी इस  गैलरी में सभी नवाबों की तस्वीरें देखी जा सकती हैं.कुछ तस्वीरें ३डी हैं.

९-मोती महल -सआदत अली का बनवाई ,गोमती नदी के किनारे तीन इमारतों में मोती महल प्रमुख है.

१०-शहीद स्मारक-गोमती की किनारे है.

११-निम्बू पार्क,हाथी पार्क आदि.-

१२-बोटानिकल गार्डन. ,चाइना हट आदि.

१३--और ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाली सब से महत्वपूर्ण जगह है--बड़ा इमामबारा.

बड़ा इमामबाड़ा:_-

 

इस इमामबाड़े का निर्माण नवाब  आसफउद्दौला ने 1784 में अकाल राहत परियोजना के अन्तर्गत करवाया था,यह विशाल गुम्बदनुमा हॉल 50 मीटर लंबा और 16 मीटर ऊंचा है। इसके संकल्‍पना कार थे किफायत - उल्‍ला, जो ताजमहल के वास्‍तुकार के संबंधी कह जाते हैं.इस संरचना में गोथिक प्रभाव के साथ राजपूत और मुगल वास्‍तुकलाओं का मिश्रण दिखाई देता है।

 

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बाड़ा इमामबाड़ा एक रोचक भवन है। यह न तो मस्जिद है और न ही मकबरा, किन्‍तु इस विशाल भवन में कई  मनोरंजक तत्‍व अंदर निर्मित हैं। कक्षों का निर्माण और वॉल्‍ट के उपयोग में सशक्‍त इस्‍लामी प्रभाव दिखाई देता है।  यह हॉल लकड़ी, लोहे या पत्‍थर के बीम के बाहरी सहारे के बिना खड़ी विश्‍व की अपने आप में सबसे बड़ी रचना है।

 

इसकी  छत को किसी बीम या गर्डर के उपयोग के बिना ईंटों को आपस में जोड़ कर खड़ा किया गया है। अत: इसे वास्‍तुकला की  एक अद्भुत उपलब्धि के रूप में देखा जाता है। इस भवन में तीन विशाल कक्ष हैं, इसकी दीवारों के बीच छुपे हुए लम्‍बे  गलियारे हैं, जो लगभग 20 फीट मोटी हैं। यह घनी, गहरी रचना   भूलभुलैया कहलाती है,  इसमें  1000 से अधिक छोटे छोटे रास्‍तों का जाल है जिनमें से कुछ के सिरे बंद हैं और कुछ प्रपाती बूंदों में समाप्‍त होते हैं, जबकि कुछ अन्‍य प्रवेश या बाहर निकलने के बिन्‍दुओं पर समाप्‍त होते हैं।

 

इस भूल भुलय्या में जाने के लिए एक अनुमोदित मार्गदर्शक की सहायता लेनी चाहिये|

इस इमामबाडे में  5 मंजिला   एक गहरी बावली भी है,जो  गोमती नदी से जुड़ी है.इसमें पानी से ऊपर केवल दो मंजिलें हैं, शेष तल पानी के अंदर पूरे साल डूबे रहते हैं। इस इमामबाड़े में एक आसफी  मस्जिद भी है.मस्जिद परिसर के आंगन में दो ऊंची मीनारें हैं.

आसफी या बड़े इमामबाडे के बारे में कुछ और जानकारी श्री प्रकाश गोविन्द जी के द्वारा –:

आठवीं एवं नवीं मोहर्रम को इस इमामबाडे में रोशनी की जाती है ! इमामबाडे का प्रकाश और आग का मातम देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं !



कहा जाता है कि इमामबाडे की मोटी-मोटी दीवारों और मेहराबों के पाये भी कुछ खुले हैं, इनमें भी भूलभुलैया का कुछ भाग है ! इसी प्रकार फर्श के नीचे तहखाना और टेढे-मेढ़े मार्ग हैं ! इनमें जो भी व्यक्ति गया वह वापस नहीं आया ! इसी कारण ब्रिटिश काल में इसको बंद कर दिया गया ! दुर्भाग्यवश भुलभुलय्या का नक्शा मौजूद नहीं है ! अगर नक्शा होता तो इमामबाड़े की भूल-भुलैया का रहस्य खुलता और भूमिगत सुरंगों का पता चलता ! इमामबाड़े के निर्माण कार्य पर खर्च होने वाला धन उस समय का डेढ़ करोंड रुपये आँका गया है ! कार्यरत श्रमिकों की संख्या 22000 बतायी जाती है !




 

कैसे जाएँ-


वायुमार्ग -लखनऊ की अमौसी एयरपोर्ट दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चैन्नई, बैंगलोर, जयपुर, पुणे, भुवनेश्वर, गुवाहाटी और अहमदाबाद से प्रतिदिन सीधी फ्लाइट द्वारा जुड़ा हुआ है।

 

रेलमार्ग -लखनऊ जंक्शन भारत के प्रमुख शहरों से अनेक रेलगाड़ियों के माध्यम से जुड़ा हुआ है। दिल्ली से लखनऊ मेल और शताब्दी एक्सप्रेस, मुम्बई से पुष्पक एक्सप्रेस, कोलकाता से दून और अमृतसर एक्सप्रेस के माध्यम से लखनऊ पहुंचा जा सकता है।

 

सड़क मार्ग -राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से दिल्ली से सीधे लखनऊ पहुंचा जा सकता है। लखनऊ का राष्ट्रीय राजमार्ग 2 दिल्ली को आगरा, इलाहाबाद, वाराणसी और कानपुर के रास्ते कोलकाता को जोडता है.

 

[राम आसरे   के कचोडी -आलू ,बेकरी  हट की पेस्ट्री  मुझे अब भी  याद  हैं.]

 

अच्छा अब अगले सप्ताह फ़िर मिलते हैं, तब तक के लिये अलविदा.



-अल्पना वर्मा ( विशेष संपादक )


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