मेरी कलम से- अंक 19

                          

                        "मेरी कलम से" -Seema Gupta

                       जीवन के मूल्यवान पाठ

 

एक राजा था जो कला का एक बड़ा प्रशंसक था. वह अपने देश में सब से अधिक कलाकारों को प्रोत्साहित किया करता था और उन्हें कीमती उपहार देता था.

 

एक दिन एक कलाकार आया और राजा से कहा, "हे राजा मुझे अपने महल में एक खाली दीवार दो! और मुझे उस पर एक चित्र बनाने दो. चित्र इतना  सुंदर होगा जिसे आपने पहले  कभी नहीं देखा होगा. मै आपको निराश  नहीं करूंगा ये मेरा वादा है. "

 

 

राजा के महल के पीछे   एक बड़े हॉल का निर्माण किया जाना था  तो राजा ने  कहा, "तुम नए हॉल में एक दिवार पर  काम कर सकते हो ." और कलाकार को  काम दे दिया गया और वह  बहुत प्रसन्न हुआ.

 

तभी  एक और नौजवान ने कहा , "हे राजा! कृपया मुझे  सामने की दीवार पर काम करने की अनुमति दी जाये  मैं भी एक कलाकार हूँ."

राजा,ने पुछा  "तुम क्या बनाने चाहते हो ?"
उस ने कहा, ", अन्नदाता मै  ठीक वही चित्र बनाऊंगा जो दूसरा  आदमी  सामने की दीवार पर बनाएगा.  इसके अलावा, मैं ये चित्र उसके चित्र को बिना देखे ही बनाऊंगा .मैं आपसे अनुरोध करूंगा की आप दोनों दीवारों के बीच  एक मोटा पर्दा लगादे  ताकि हम एक दूसरे को  देख तक न सके .

 

 

अब, यह एक बहुत बडी बात कही थी उस नौजवान ने.   राजा और पहले कलाकार सहित राजा के दरबार में सब लोग, हैरान थे लेकिन राजा को ऐसे  हैरत भरे कारनामे पसंद थे इसलिए राजा ने उस  युवा कलाकार को एक मौका देने का फैसला किया.

 


अगले दिन एक मोटा पर्दा बीच में डाल दिया गया और दोनों ही कलाकारों को काम करने के लिए कहा गया. पहला कलाकार रंग, तेल, पानी आदि जरुरत की वस्तुएं  नियमित रूप से लाता रहा.

 
दूसरा कलाकार  एक कपड़ा और पानी की एक बाल्टी हर दिन  साथ लाता रहा .

 

एक माह के बाद पहले कलाकार ने राजा से कहा कि उसका काम पूरा हो  गया है और  राजा उसे देख सकते हैं.


राजा ने दूसरे कलाकार के लिए संदेशा भेजा  और उनसे पूछा, "आपका  काम कब तैयार होगा? मैं इस शाम को  पहली  दीवार को देखने के लिए आ रहा हूँ." नोजवान ने  कहा, "मेरे अन्नदाता मेरी  दीवार  भी तैयार है!"

 

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राजा  पहले  कलाकार की दीवार को देखने के लिए गया और  चित्र से बेहद प्रभावित हुआ  और कलाकार को  पुरस्कार के रूप में एक मोटी रकम दी.

 

फिर राजा ने पर्दे को  खोलने  के लिए कहा. और निहारने लगा ! वही चित्र सामने की दीवार पर भी मोजूद था ! अद्भुत! लेकिन सच था !

 

प्रत्येक पंक्ति, प्रत्येक छोटी रेखा  और विस्तार  बिल्कुल वही चित्र !. लेकिन इस आदमी को कैसे पता चला की दूसरी दिवार पर क्या चल रहा था, उसने तो पर्दे के दूसरी तरफ देखा तक  नहीं था.  तो  यह कैसे किया था?

 

राजा इस  रहस्य के बारे में जानना चाहता था. राजा ने उस कलाकार को  डबल इनाम दिया. और कहा , मैं वास्तव में तुम्हारे काम से बहुत खुश हूँ. पर तुमको  मुझे बताना होगा, के ये तुमने  कैसे कर दिया?"

 

नोजवान कलाकार ने कहा , "यह बहुत आसान है "मैं बस हर दिन दीवार को पॉलिश करता रहा, यह दीवार  सफेद संगमरमर से बनी हैं. सामने वाला कलाकार संगमरमर से बनी दिवार को तब तक  पोलिश करता था जब तक  एक आईने की तरह न चमकने लगे और फिर सारे . कमरे में चित्र का प्रतिबिंब,नज़र आ जाता था.

 

अपने आप को कैसे  पॉलिश या साफ़ किया जाये यही इसका मतलब है

क्योंकि जब हम अपने मन और आत्मा को पॉलिश,करते हैं (यानि इर्ष्या द्वेष दुःख आदि को निकाल फैंकते हैं )  हम अपने में भगवान की परछाई देखते हैं.

 

ऐसा कहा जाता  है कि दुनिया हमारा  एक प्रतिबिंब है. जैसे हम खुद है वैसी ही हमे दुनिया नज़र आती है.
यदि हम दुखी हैं,,, गुस्सा, बेचैन उदास ईर्ष्या करते हैं  तो दुनिया  हमे वैसे ही नजर आती है.

अगर हम  खुश हैं, दुनिया हमे स्वर्ग लगती है.

आप खुद फैसला ...करे की अपने लिए कैसी दुनिया देखना चाहते हैं.

 

अच्छा अब अलविदा अगले सप्ताह तक.


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